Thursday, 20 August 2015

राखी

रक्षाबंदन भाइयों और बहनों के भावनात्मक रिश्तों का प्रतीक है जिसमे बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा बांधकर उसके शुभ की कामना करती है जिसके एवज में भाई, बहन की रक्षा का वचन देता है रक्षाबंधन का यह त्यौहार जाति ,धर्म ,अपने पराये से ऊपर उठकर सामाजिक सद्भावना का परिचय देता है
                             वीर हुमायूँ बंधु बना था ,
                             विश्व आज भी साक्षी है। ………
मेवाड़ की रानी कर्मावती के द्वारा हुमायु को भेजी गई राखी इस बात का प्रमाण है कि भाई बहन के रिश्ते जाति और मजहब से ऊपर है । बदलते समाज में आज भी लोग इस परंपरा को निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे ।

वास्तव में रक्षा सूत्र का चलन अति प्राचीन है राखी तो मात्र एक प्रतीक है जिसमे बहन , भाई , माँ  या गुरु अपने भाई पुत्र या शिष्य को एक संकल्प से बढ़ता  है और उनके कल्याण की कामना करता है। …।
                       
                           येन बद्धो  बलि राजा दानवेन्द्रो महाबला तेन त्वा मनु बध्नामि रक्षे  माँ चल माँ चल ॥

आज समाज में महिलाओ की स्तिथि देखकर महिलाओं की दयनीय अवस्था का अंदाजा लगाया जा सकता
इस पुरुष प्रधान समाज में हम माँ ,बहन और बेटी के योगदान को नकार नहीं सकते पर परन्तु फिर भी यदि कोई लड़की अपने बाप से अपना हक़ मांग ले तो शायद  उसे बहन या बेटी नहीं समझा जा सकता । इतना ही नहीं  एक स्त्री शादी के बाद भी पुरुषो के हाथ की कठपुतली बन कर रह जाती है । जब तक स्त्रीयां  खुद अपने पैरों पर नहीं खड़ी होती तब तक इन समस्याओ का समाधान निकलना मुस्किल है ।
आज हमारे -आपके पास एक भाई और बाप के तौर पर रक्षबंधन के अवसर पर संकल्प लेने की जरुरत है कि  एक भाई और बाप के रूप में हम उन्हें अपने पैरो पर खड़े होने लिए न केवल प्रोत्साहित करेंगे बल्कि हर स्तर पर मदद भी  करेंगे तभी हम सच्चे अर्थो में अपनी बहनो को राखी का उपहार दे पाएंगे ॥

Friday, 7 August 2015

गुनाह

न जाने क्या गुनाह था मेरा

मेरे अश्क़ों को ये सजा दी गयी
कैद में रखा  इसे ऐसी
ये न निकल पते है न बध। .... ............. 

Wednesday, 15 July 2015

               दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए चल  रही कामधेनु योजना के तहत केवल २२ पशुपालको को ऋण स्वीकृत किया गया है जबकि योजना के तहत ३० पशुपालको को लाभ पहुचाने का लक्ष्य था इसके बावजूद पशुधन विभाग का दावा है की कामधेनु योजना लक्ष्य पूर्ण कर चुकी है
            पशुपालन ,दुग्धउत्पादन एवं ग्रामीण स्तर पर रोजगार को बढ़ाने के लिए मिनी कामधेनु योजना की शुरुआत की गयी जिसके तहत व्याजमुक्त ऋण देकर किसानो को प्रत्साहित किया गया ।  योजना के तहत ५०-५० पशुओं का आवंटन किया गया जिसमे गयों और भैसों की उन्नत प्रजातियों का वितरण किया गया । योजनानुसार कुल लगत का २५ प्रतिशत पशुपालकों को स्वयं जमा करना था शेष ७५ प्रतिशत बैंकों द्वारा ऋण के रूप में प्राप्त कर जमा करना था मिनी कामधेनु योजना में ३० लाभार्थियों के चयन का लक्ष्य था परन्तु इस योजना में अभी तक मात्र २२ लोगो को ही ऋण स्वीकृत किया गया है और मात्र ८ क्रियाशील इकाइयों की स्थापना की गयी है ।
           लाभार्थियों के चयन के लिए ऐसे लोगो को वरीयता देने का नियम था जिन्होंने पहले भी पशुपालन किया हो । इसके अतिरिक्त लाभार्थी के पास शेड के आलावा कम से कम एक एकड़ भूमि होना आवश्यक है  मिनी कामधेनु योजना के तहत लाभार्थियों को ५२ लाख रुपयो की कुल लागत का २५ प्रतिशत १३ लाख रुपये मार्जिन मनी के रूप में जमा करना होता है जिससे केवल बड़े किसानो को ही लाभ मिल पाया इसके पहले भी कामधेनु योजना के तहत बड़े किसानो को ही लाभ मिल पाया था । छोटे किसानो और पशुपालको को लाभ पहुचने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा माइक्रो कामधेनु योजना की चर्चा चल  रही है जिसके तहत २५-२५ पशुओ का आवंटन कर मार्जिन मनी घटाकर छोटे किसानो को भी लाभ पहुचाया जायेगा । अब देखना है की पशुधन विभाग छोटे किसानों पर कब मेहरबान होगा ।

Friday, 27 March 2015

मेलो की संस्कृति में इलाहाबाद

                              मेलो की संस्कृति में  इलाहाबाद

              अनेकता में एकता के सूत्र को संजोये हुए भारतीय संस्कृति में मेलो के पर्व का विशेष महत्व है मेला किसी भी स्थान की समृध्द सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक होता है |
              इलाहाबाद की सांस्कृतिक विरासत का आंकलन इलाहाबाद में लगने वाले लगभग 100 मेलो से किया जा सकता है जिसमे सबसे बड़ा मेला है माघ मेला | 1935-40 के समय प्रत्येक वर्ष  3-4 लाख यात्री प्रतिवर्ष त्रिवेणी स्नान के लिए इलाहाबाद आते थे | हर छठे वर्ष अर्धकुम्भ के अवसर पर यह भीड़ 10-15 लाख पहुच जाती थी वाही प्रत्येक 12 वे वर्ष कुम्भ के अवसर पर यह भीड़ 30-35 लाख तक पहुच जाती है | सन  2013 में कुम्भ के अवसर पर 5 वर्ग किमी अर्थात 10339 बीघे जमीन पर विस्तृत इस मेले में स्नानार्थियो की संख्या 5 करोड़ तक पहुच गई जो लगभग 55 दिन तथा 55 रात्रि दर्शन एवं उत्सव का केंद्र रहा |
              कुम्भ का अर्थ है घड़ा तथा एक राशि का नाम है | पुरानो में वर्णित कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय विभिन्न वस्तुओ के साथ-साथ अमृत कलश की भी उत्पत्ति हुई जिसे असुरो से बचने के लिए देवतागण भागे जिनका असुरो ने पिछा किया निरंतर 12 दिन तथा 12 रात्रि दौड़ते समय अमृत कलश से कुछ बूंदे हरिद्वार , नाशिक , प्रयाग और उज्जैन में गिरी | इसी घटना के स्मारक के रूप में प्रति 12 वे वर्ष कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है|
              जब बृहस्पति मेष राशि में तथा चन्द्रमा और सूर्या मकर राशि में होते है तो प्रयाग में ऐसे योग कुम्भ कहलाता है| इलाहाबाद में कुम्भ मेले का सबसे पुराना उल्लेख महाराजा हर्ष के समय का मिलता है , जिसे चीन के प्रसिद्ध भिक्षु ने ईशा की सातवी शताब्दी में अपनी आँखों से देख कर लिखा था |
             बौद्ध भिक्षुओ में एक पुरानी प्रथा यह प्रचलित थी प्रत्येक शुक्ल पक्ष की द्वितीया  तथा पूर्णिमा को वे एकत्र होकर वे प्रायश्चित के रूप में अपने-अपने पापों को स्पष्ठतया स्वीकार करते थे |
              महाराजा हर्ष के समय यह प्रायश्चित प्रत्येक छठे वर्ष हुआ करता था जिसे लोग आनंद की खेती कहते थे यह अवसर ही अर्धकुम्भी या कुम्भ का होता था | महाराजा हर्ष ने छठी बार इसका आयोजन हेन सान्ग के समय किया था |
              इसके अतिरिक्त इलाहाबाद में लगने वाला दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मेला दधिकांदो का मेला है जो अलग-अलग तिथियों पर प्रयाग के ६ अलग-अलग स्थानों पर लगता है जिसमे सलोरी, रसूलाबाद-तेलियरगंज, राजापुर एवं कतरा प्रमुख है | परम्परागत रूप से ये श्रीकृष्ण छठी के बाद पहले शनिवार को सलोरी में , बड़ा इतवार को राजापुर और उससे पहले तेलियरगंज के दधिकांदो मेले का आयोजन होता है जो “नवयुवक संघ दधिकांदो मेला कमेटी आयोजित करती है | बाढ़ की वजह से पिछले गत वर्षो में मेले के आयोजन में फीकापन देखने को मिला है |
             इसके अतिरिक्त अषाढ़ के कृष्ण पक्ष की अष्ठमी को कड़ा की सीतला देवी का मेला लच्क्षगिरी तहसील हंडिया के सोमवती अमावश्या का मेला और वारूणी के अवसर पर गंगा स्नान के मेले होते है | इसके पश्चात् पंडीला तहसील सोराव के महादेव का मेला और ककरा तहसील फूलपुर के दुर्वाषा का मेला है जोकि शिवरात्रि के अवसर पर मनाये जाते है | जेठ के महीने में सिकंदरा तहसील फूलपुर में गाज़ी मिया का मेला और आषाड में परगना बारा में अमिलिया देवी का मेला आयोजित होता है जिसमे हजारो की संख्या में भीड़ होती है |
            ये तो वे मेले है प्रयाग में प्रतिवर्ष बड़े ही धूम धाम से बिना किसी अवरोध के मनाये जाते रहे है| इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी मेले है जो बीच में अपना अस्तित्व खोते नजर आ रहे थे परन्तु आज एक बार फिर अपनी पुरानी रंगत में नजर आते है जिसमे प्रयाग का दशहरे का मेला प्रमुख है जो १९२४ में हिन्दू –मुस्लिम दंगे तथा मश्जिदो के सामने बाजे बाजने पर मुसलमानों द्वारा प्रश्न उठाने मेला स्थगित हो गया था | इस मेले के आयोजन के चार केंद्र थे जिसमे कटरे और दारागंज के मेले प्रसिद्ध थे वर्तमान में इन मेलो का आयोजन फिर से शुरू किया गया है जो सुचारू रूप से बिना किसी अवरोध के चल रहे है |
            इसके अतिरिक्त मोहर्रम के मेले भी विभिन्न स्थानो पर सफलतापूर्वक मनाये जाते है | इन सब के अतिरिक्त प्रयाग में निम्न स्तर पर ढेर सारे मेलो का आयोजन किया जाता है जो प्रयाग में मानव समाज की एतिहासिकता का चित्र प्रस्तुत करती है| इनके आयोजनों के पीछे विभिन्न प्रकार के सामाजिक कारण होते है जिनमे कभी देवताओ की असुरो पर विजय तो कभी किसी समाज सुधारक संन्यासी का समाज के लिए संघर्ष, कभी किसी रजा का अपनी प्रजा के लिए समर्पण तो कभी स्वतंत्रता सनानियो का अंगेजो के बिरुद्ध लड़ाई इत्यादि | कारण चाहे जो भी रहा हो परन्तु उद्देश्य सदैव सर्वसाधारण की भलाई तथा जन कल्याण से ही जुदा रहा | देश के अन्य शहरो में भले ही लोग अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हो | परन्तु प्रयाग का नाम आज भी अपनी परम्पराओ और संस्कृतियो के लिए ही जाना जाता है और उम्मीद है मेलो के आयोजन से ऐसी परम्पराओ और संस्कृतियों को बढ़ावा मिलेगा |
                                                                                                           
    



Thursday, 19 March 2015

पत्र लेखन

          

               
             पत्र – लेखन


          पत्र-लेखन संचार माध्यम का एक अनूठा तरीका, जिसमे प्रेषक शब्दों को भावनाओं में पिरोकर बिना अपनी उपस्थिति के प्राप्तकर्ता को अपनी उपस्थिति का एहसास कराता है. पत्रों का सिलसिला यूं आज का नही है अपितु मानव समाज के विकास में पत्रों ने अहम भूमिका निभाई है. संचार क्रांति के बाद भी पत्रों में निहित गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए तमाम व्यवसायिक कम्पनियों ने व्यापारिक डाक को ही संचार के लिए सर्वाधिक महत्व दिया.
         दुनियां का सबसे पुराना ज्ञात पत्र ईसा पूर्व की २०वीं सदी कालखण्ड में सुमेरु का माना जाता है, जो की मिटटी की पटरी पर लिखा गया. मनुष्य की विकास यात्रा के साथ पत्रों का सिलसिला भी शुरू हुआ, अति प्राचीन काल में संकेतों से सन्देश सम्प्रेषण की परम्परा थी. लिपियों के आविष्कार के बाद शिलाखंड, धातुपत्र, कपड़े या वृक्ष के पत्तो के विभिन्न स्वरूप पत्र भेजने के साधन बने. कागज व लेखन सामग्री के अविष्कार तथा डाक-प्रणाली के व्यवस्थित विकास के बाद तो पत्रों को तो जैसे पंख से लग गये.
        वैसे तो भारत में व्यवस्थित पत्र-प्रणाली १७७४ ई. में ब्रिटिश गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने स्थापित की थी, परन्तु  पत्र व्यव्हार की परम्परा भारत में बहुत पुरानी है. नल-दमयंती के बीच हंस ने डाकिया का कार्य किया इसी प्रकार अन्य कई प्रेम प्रसंगों में कबूतर और तोते जैसे पक्षियों को डाकिये का स्वरूप दिया गया. राजाओं महाराजाओं तथा मुग़ल शासकों ने हरकारों के जरिये सन्देश सम्प्रेषण का कार्य किया. भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में भी पत्रों ने एक खास भूमिका निभाई है.
          संचार को जन्म और पंख देने वाला संचार का यह ऐतिहासिक माध्यम पत्र लेखन हमारे आज के इस आधुनिक जगत में अपनी पहचान और वजूद खोता नजर आ रहा है लोग इसे बिशेष अवसरों पर मनोरंजन के तौर पर ही उपयोग में ला रहे है| सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि संचार के इस माध्यम की अहमियत और उपयोगिता भी कम हुई है|
          जादातर छात्रो के लिए तो यह मनोरंजन का साधन बन के रह गया है, गृहणी महिलाओं के सर्वेक्षण से पता चलता है कि महिलाये केवल विशेष अवसरों पर ही पत्र लिखती है ,किसानो के लिए भी इसकी कोई खास उपयोगिता नहीं है , परन्तु कर्मचारियों के सर्वेक्षण से पता चलता है कि सरकारी दफ्तरों में आज भी पत्रों की अहमियत और उपयोगिता जीवंत है जो की किसी निजी संस्था द्वारा पत्र न भेजकर सरकारी डाक द्वारा पत्र भेजना अधिक पसंद करते है |
          लगभग ८० फ़ीसदी विद्यार्थियों ने इसे आंशिक उपयोगी माना जैसा की साधारण गृहणिया भी मानती है ग्रामीण किसान भी इसे आंशिक उपयोगी मानते है जिनकी प्रतिशतता ६० है ,परन्तु सरकारी कर्मचारियों ने इसे सबसे अधिक महत्ता देते हुए ,६० फ़ीसदी लोगो ने अत्यधिक् उपयोगी की श्रेणी में रखा जबकि ४० % ने आंशिक |
          जिन्होंने यह मन कि उनके जीवन में पत्रों कि किसी न किसी वजह से उपयोगिता है उन्होंने इसे गोपनीयत और निजी अनुभवों के कारण उपयोगिता की श्रेणी में रखा |



Wednesday, 18 February 2015

कुछ कहा नहीं जाता


क्या कहे की कुछ कहा नहीं जाता 

दर्द मीठा है पर सहा नहीं जाता 

Wednesday, 7 January 2015

RELATION ( रिश्ता )

                                 


A relation means to realise something better and if you are not feeling better in a relationship then leave that otherwise at a place you are deceiving yourself