Friday, 6 May 2016

परीक्षा परिणाम आने की ख़ुशी

सुबह ६ बजे सोकर उठा  ही था कि पापा ने आवाज लगाई अनंत रिजल्ट कितने बजे आ रहा है???सारी नींद हवा में  उड़ गयी...मैंने जवाब दिया पापा २ बजे तक आने की सम्भावना है |
पापा को मेरे रिसल्ट का हमेशा मुझसे ज्यादा बेसब्री से इन्तेजार रहता था ; कारण बिलकुल स्पष्ट था,पापा मेरे लिए एक साथ शिक्षक,पिता और माँ तीनों की भूमिका में होते थे| माँ की भूमिका में इसलिए क्योकि तब मै, भैया और पापा के साथ गोण्डा में रहता था| मम्मी उस समय गाँव वाले घर पर रहा करती थी...इसलिए  मुझे लेकर उनकी उत्सुकता हमेशा सामान्य पिता से कई गुना अधिक होती थी...औ आज तो वैसे भी मेरी एक वर्ष की और पापा के 14 वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम आने वाला था...
आज तो मैंने सुबह ही नहाकर सबसे पहले पूजा की | ये इस साल की मेरी दुसरी पूजा थी | पहली पापा ने कराई थी वो भी तब; जब मेरे इसी सत्र का पहला दिन था| मुझे आज तक नहीं समझ आया की पापा जो स्वयं कभी मंदिर नहीं जाते थे,उस दिन मुझे मदिर ले जाने के पीछे क्या विचार किया होगा???सोचता हूँ कभी पूछुंगा????
 खैर पूजा करने के बाद मै रोज की तरह अपना दैनिक काम करने कि कोशिश करने लगा | पर मन तो परीक्षा परिणाम में लगा हुआ था | क्या होगा??अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो पापा क्या कहेंगे??कॉलोनी के लोग क्या कहेंगे?? यही सोच-सोचकर कभी हिंदी के पेपर में छूटा हुआ प्रश्न याद करके पछताता तो कभी रसायन के  सभी प्रश्नों के सही होने का गर्व भी होता | रिजल्ट के इन्तेजार का समय कितना उहापोह भरा होता है;साल २००८ मुझे खूब बता रहा था और मै समझ पा रहा था| उस दिन मैंने अपने प्रश्नपत्रों को कम से कम ५० बार देखा होगा और ढेर सारे तरीकों से जोड़ घटा के नंबर जुटाने का प्रयास रहा था | मान लो हिंदी में ६५ ही मिले तो इंग्लिश और केमिस्ट्री कवर कर लेगी |सोचते -सोचते दिमाग का दही हुआ जा रहा था | पापा ऑफिस जा चुके थे | मेरे मन में उथल-पुथल मची हुई थी| कभी घर के बाहर जाता कभी अन्दर आता ,कभी खिड़की से पापा के आने की राह निहारता | २ बज चुके थे और मेरी धड़कन बढ़ हुई थी | थोड़ी देर बाद राधे(कालोनी का ही एक लड़का) दौड़ता हुआ आया था| मै घर के बहार बैठकर खुद को सांत्वना दे रहा था,सब बढ़िया होगा,तुम्हारा रिजल्ट अच्चा नहीं होगा तो किसका होगा, अब क्या डरना जो होना होगा ,होगा ही  आदि आदि | राधे पास आकर बोला भैया अभी सरबर डाउन है |
समय बीत नही रहा था और दिमाग बुलेट ट्रेन हो गया था| थोड़ी देर बाद मुझे पापा की गाडी आती दिखाई दी | पापा घर आ चुके थे | मेरी चेहरे की भाव भंगिमा छण-छण में बदल रही थी | पापा के साथ पाण्डेय अंकल जी भी थे | पापा ने मुझसे सिर्फ इतना ही कहा गाडी लॉक कर दो और पीछे मिठाई रखी है ले आओ | पापा का भाव थोडा रूखा लग रहा था मुझे एहसास होने लगा कि मेरे मार्क्स अच्छे नहीं हैं क्योंकि पापा के चेहरे पर जीत वाली ख़ुशी नहीं थी |मेरे अन्दर आते ही -
पापा- पाण्डेय जी को पानी पिलाओ और दो कप काफी बनाओ|
मै अन्दर से मीठा और पानी ले आया,ग्लास को टेबल से उठाते हुए पापा ने कहा "पास तो हो गये हैं आप"|
मेरी आँखों में आंशु भर आये, लगभग रोने ही वाला था कि पाण्डेय अंकल जी ने कहा अनंत आपने अच्छे अंको के साथ परीक्षा पास की है पर मिश्रा जी आपके नंबर से संतुष्ट नहीं हैं | यह वर्ष सन 2008 का था और यू पी बोर्ड हाई स्कूल का रिजल्ट महज 39 % था  | मेरे कॉलेज ( राजकीय इंटर कॉलेज गोंडा) में मात्र 9 छात्र प्रथम श्रेणी में पास थे | मेरे स्कूल में मेरा तृतीय स्थान था; मै 68.16 अंको के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया था |
तब से ढेर सारी परीक्षाएं पास की और वर्तमान समय में इलाहबाद विश्विद्यालय का छात्र हूँ और आज  एम. ए पत्रकारिता जनसंचार तृतीय सेमेस्टर .की परीक्षा 52 प्रतिशत अंको के साथ उत्तीर्ण की है | मुझे नहीं पता के मुझे खुश होना चाहिए या नहीं | मेरी आँखों में उस दिन की तरह आज भी आंशु है पर मै आज भी निकाल नहीं सकता....

किसकी कमियां निकालू किसको दोषी ठहराऊ |
जमाना ही कहता है के घर से निकल जाऊं
चाहत नहीं है मेरी बगावत करने की
फिर क्या करूं, हारकर यूँ बैठ जाऊ ||||

जब तक तोडेगें नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं|

Saturday, 9 April 2016

"जूठन " क्या सीखा???

ओम प्रकाश जी द्वारा लिखित जूठन किसी जाति  की नहीं अपितु हमारे चित-परिचित  एवम अग्रणी  कहे जाने वाले समाज के पिछडे  पन का एहसास  कराती है की कैसे हमारे समाज के उत्क्रष्ट लोग जाति ,बिरादरी , धर्म के नाम पर निम्न स्तरीय जीवन यापन करने वाले लोगो को आतंकित एवम प्रताड़ित  करते थे ।
          आत्मकथा जूठन हमारे समाज के उस घिनौने और क्रूर समाज का दर्पण है जहा मानवता और  इंसानियत केवल नाम मात्र की चीज बची है जहा लोग  जाति , धर्म  के आधार पर  किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की  पहचान करते है पुस्तक में सवर्णो का दलितों पर ही नहीं  बल्कि जाति के उचे दलितों का अपने से निम्न स्तरीय दलितों पर होने वाले अत्याचारों का भी वर्णन किया गया है जो हमारे सम्पूर्ण  समाज की सोच का भी आइना है
          एक पाठक के तौर पर मै समझता हूँ कि हमारे समाज में जातिवाद , धर्मवाद इस कदर हावी है जैसे मानो मनुष्य के अन्दर की मानवीयता जो इन्सान को  पशुओं से अलग करती है, ख़त्म होती जा रही है अक्सर लोग खुद के हित के लिए जातिवाद ,धर्मवाद के नाम पर नवयुवको को भड़काते समय यह भूल जाया करते है की किसी जाती या धर्म का अनुयाही होने से पहले हम एक इन्सान है।  हमारे समाज के विकास एवं निर्माण के समय प्राचीन काल में विद्वानो ने धर्मं बनाया ,जाति बनाई ताकि हर एक इन्सान एक दूसरे इन्सान के काम आ सके ,पारस्परिक सहयोग की भावना जाग्रित हो सके और वे एक ही समाज में प्यार से एकसाथ -एकजुट होकर रह सके । परन्तु आज स्थिति कुछ और है जाती और धर्म को लोग अपनी अस्मिता और प्रतिष्ठा के तौर पर देख रहे है परस्पर सहयोग की भावना जो धर्म और जाति के उद्भव की मूलभूत आवश्यकता थी,भूल गए है |
हमारे देश ने राजतन्त्र नहीं स्वीकारा, लोकतंत्र स्वीकारा जहाँ राजा का लड़का ही राजा नहीं होता बल्कि जनता जनार्दन के चरणों की पग्धुलि जिस व्यक्ति के मस्तक पर लग जाती उस व्यक्ति का राजतिलक हो जाता है चाहे वह किसी जाति, बिरदारी या धर्म का ही क्यों न हो | लोकतंत्र को मानने वाले मेरे दोस्तों यदि आप राजा के लड़के को राजा नहीं  स्वीकार सकते तो ब्राह्मण क्षत्रीय,वैश्य या शूद्र के बच्चो को ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य या शूद्र कैसे मान  सकते है  आज हमारे समाज में युवाओ को एक ऐसे समाज के निर्माण की आवश्यकता है जहा जाति, धर्म .बिरादारी से ऊपर उठकर लोग ज्ञान,एकता ,शील और परस्पर सहयोग की भावना जागृत कर सके | तभी सच्चे अर्थो में समाज का निर्माण हो सकेगा जो  देश एवं राष्ट्र के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा |

Thursday, 7 April 2016

"NECESSITIES"

                                      

                                                  Everything is necessary
                    you are necessary
                                          I would be
                   Good is necessary
                                          Bad may be
                   Laughing is necessary
                                          Weeping may be
                   Loving is necessary
                                          To hate may be
                   To live is necessary
                                          To die may be
                                                                    
                                                             ANANT NIMOSHI

Wednesday, 6 April 2016

क्या लिख दूं

आज का आज लिख दूं
शासकों का  इतिहास लिख दूं
बर्बरता की कहानी पर
बैठे बिठाये किताब लिख दूं

सहम जाता हूँ मै सच्चाई लिखते लिखते
कोशिश करता हूँ  इनकी क्रूर बीरता की बड़ाई लिख दूं
कलम गर न करे बगावत तो वाहवाही लिख दू
भूल जातें  हैं लोग ऊँची इमारते देख कर
गरीबों के घुटन की दुहाई लिख दूं


अनंत निमोशी

Tuesday, 5 April 2016

हिंदुस्तान की वर्त्तमान स्थिति

हिंदुस्तान की स्थिति भी मेरे घर सी हो गई है
नींव की ईट बनने को कोई तैयार ही नहीं है
सब आई ए एस ही बनना चाहते है
हिंदुस्तान की परम्परा है घर बनाना, अब घर बनाने के लिए तो ईटा चाहिए न | वो भी मजबूत ईट । अरे जिससे नींव बनती है | एक बार नींव बन जाय फिर तो कैसा भी ईटा चल जायेगा | ईंटों से और गारों से घर नहीं बनता साहब, घर वालों से बनता है | तो नीव की ईट चाहिए । मजबूत ,शशक्त, कठोर जिसके ऊपर इमारत बनाई जा सके | अब जो मजबूत है ,कठोर है शशक्त है |कहने का तात्पर्य है जो सक्षम है, वो नींव क्यों बने | वो तो बुलंदियां छूना चाहता है | और चाहे क्यों न उसका हक़ है | तो साहब जानि लेव अइसन घरों न बनि पायी | रहो सभे असुरक्षित आसमान के नीचे | जब ओला और गोला बरसी तब समझ मा आई के घर काहे बारे जरुरी है |
#हिंदुस्तान की राजनीति 

Sunday, 3 April 2016

सस्ती लोकप्रियता

जी एक टेर्मिनोलोजी है सस्ती लोकप्रियता......
सस्ती लोकप्रियता का मतलब ऐसी लोकप्रियता से है जो सस्ते में बिना किसी परिश्रम के मुफ्त में मिल जाती है.....
अब मै विषय पर आता हूँ | कैलाश सत्यार्थी !!!!!!! नाम कुछ सुना सा लगा होगा | थोडा दिमाग पर जोर डालते है | अब कुछ लोगो को याद आता है ओ हाँ नोबल प्राइज विनर | जी महज 26 साल की उम्र में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ दी | बचपन बचाओ आन्दोलन की शुरुआत की क्योकि क्योकि उन्हें आज के बच्चो में कल का जिम्मेदार इंसान दिखता था| विश्व भर के 144 देशों के 83000 से अधिक बच्चों के भविष्य को सवारने का काम किया | 35 साल निस्वार्थ मेहनत करने के बाद नोबल पुरस्कार मिलता है और 61 वर्ष कीअवस्था में हम और आप ऐसे महात्मा के बारे में थोडा बहुत जान पाते हैं................
जी और दूसरा नाम है कन्हैया कुमार जे.एन.यु. अध्यक्ष | जो मात्र एक बयानबाजी से देश भर में मशहूर हो गया | और मै दावे के साथ कह सकता हूँ की आप इस इंसान को कभी नहीं भूलेंगे कैलाश सत्यार्थी को चाहे भूल जांय | टी वी पर न्यूज़ चैनल्स में, रेडियो पर फेसबुक पर, ट्विटर पर हर जगह आपको ये कन्हैया कुमार मिल जायेंगे | मै कड़े तौर पे इस इंसान की निंदा भी नहीं करूंगा | आखिर मै जानता ही कितना हूँ सिर्फ सुनी सुनाई बाते | परन्तु मुझे एक बात नहीं समझ आती की हंगामा इत्ता क्यों है| क्या हम आप किसी के इशारों पर चल रहे है कल तक सहिष्णुता/असहिष्णुता,कलबुर्गी,सनातन संस्था ,सम्मान वापसी चल रही थी,लोग किसी इंसान के मरने पर भी उसके आदर्शो के खिलाफ राजनीति कर ले रहें थे ,और अब ये कन्हैया कुमार | कौन है ???????????????
जो हमें जैसा चाहता है सोचने पर मजबूर कर देता है | हम आप वैसा ही सोचते है जैसा सामने वाला चाहता है |
जी मीडिया की भागीदारी भी बराबर ही है और हमारी आपकी भी | और जब तक ये हम आप इस प्रकार की ख़बरें चाव से देखते रहेंगे तबतक सस्ती लोकप्रियता बटोरने के चक्कर में इस प्रकार की बयानबाजी और भाषानबाजी होती रहेगी ..........
‪#‎दिमाग‬ का दही

Saturday, 2 April 2016

सिनेमा तक समाज



मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो सोच सकता है उसकी अभिव्यकि कर सकता है अपने आस पास घट रही घटनाओं का आंकलन कर सकता कार्य और कारण के बीच सम्बन्ध स्थापित कर सकता है| अर्थात समझ बूझ सकता है और इसी आधार पर सीख कर सामाजिक प्राणी होने की आधारशिला विकसित करता है | सीधे शब्दों में मनुष्य एक नकलची प्रवृति का प्राणी है जो देख-देख के सीखता है | और फिर उसमे परिमार्जन करता है और अपनी समझ के आधार पर विकास करता है | हर इंसान के ऊपर उसके आस पास की वस्तुओं का घटनाओं का वातावरण का प्रभाव पड़ना बड़ी ही स्वाभाविक प्रक्रिया है क्योकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ती समाज द्वारा ही संभव है | इस प्रकार के प्रभाव ने ही मनुष्य को जंगली, बर्बर, आदिमानव से सामाजिक इंसान बना दिया | और जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य होता गया मनुष्य सीखने के लिए अपने विचारों के आदान प्रदान के लिए ढेर सारे तरीके इजात करने लगा | कभी पक्षियों द्वारा संदेशों का सम्प्रेषण किया तो कभी हरकारों द्वारा | आज स्थिति बदल चुकी है| मनुष्य ने हवाओं के माध्यम से संदेशों का सम्प्रेषण करने की कला में महारत हासिल कर ली है | टी वी , रेडियो ,टेलीफोन ,फैक्स ,कंप्यूटर इन्टरनेट जैसे तमाम स्रोत है जिसके माध्यम से हम सूचनाओ को बड़ी ही आसानी से बहुत कम समय में एक बड़े समूह तक पंहुचा सकते है | टेलीविज़न उनमे से एक है जिसके माध्यम से सूचनाओं का सम्प्रेषण बड़ी आसानी से होता है | टेलीविज़न के कार्यक्रमों समाचार, रियलिटी शो इन्फोटेन्मेंट शो और सिनेमा द्वारा यह प्रक्रिया चलती रहती है | और मनुष्य और समाज को प्रभावित करती रहती है | सिनेमा समाज को प्रभावित करने की दौड़ में सबसे आगे है क्योकि यह एक दृश्य श्रव्य माध्यम है |

Friday, 1 April 2016

" LIttLE "

  

little you are 
            and little is this world
loving you are
            and loving is this world
different you are 
            and different is this world
good you are 
           and good is this world
as you are
           the world is so...........

                                             ANANT NIMOSHI

Thursday, 31 March 2016

जिंदगी जीने के तरीके

मेरी माँ मेरे लिए खाना पकती है ये उसका कर्त्तव्य है ,पिता न जाने किन विषम परिस्थितियों में पैसे काम कर लातें हैं ,ये उनका कर्त्तव्य है | हमें हर जगह दूसरों का कर्त्तव्य दिखाई पड़ता है जैसे हमारा कोई कर्तव्य ही न हो |
गर्मियों में भी चूल्हे की आंच के  सामने जब एक माँ भोजन पकाती है और एक पिता ४५ डिग्री सेल्सिउस तापमान होने के बावजूद भरी दोपहरी में जब चार पैसे कामने के लिए तपता है तो उसे अपने पिता होने का कर्त्तव्यबोध नहीं बल्कि वात्सल्यबोध होता है | उस वक्त उन्हें चूल्हे और ज्येष्ठ की तपन नहीं अपने बच्चो की खुशी याद आती है | एक माँ सोचती है  बढ़िया भोजन करके मेरा बेटा खुश हो जायेगा और एक पिता सोचता है की इन पैसो से उसकी वो जरूरते पूरी करूंगा जो मै नहीं कर पाया | पर क्या हमारा इतना भी फर्ज नहीं बनता इसके एवज हम अपने माँ पिता को धन्यावाद ज्ञापित करे | शब्द जरुर छोटे है मगर इनमे चमत्कारिक ताकत है | इन शब्दों से इंसान जीवंत हो उठता है | वो खुद को उर्जावान महसूस करता है |
तो हर उस इंसान को जिसने कभी आपकी खुशी के लिए कुछ किया हो शुक्रिया जरूर कहें .....

ख़ूबसूरत,शुक्रिया काबिलेतारीफ
                  शब्द हैं शब्दों का कमाल देख ले
इंसानियत जिन्दा रहती है इन चंद लफ्जों से
                 एक बार कह के देख ले एक बार सुन के देख ले ॥॥ 

Wednesday, 30 March 2016

एक माँ की आवाज

उन बच्चों को समर्पित जो सस्ती लोकप्रियता के आडम्बर में अपनी माँ से बगावत कर रहे हैं
ऐसी ही एक माँ की पुकार

मै तेरी माँ हूँ मेरी पुकार सुन ले
मानकर तू-हार मेरी एक बार सुन ले
न लगा नारे मेरी बर्बादी के
मै तेरी हर बात सुनती हूँ
तू मेरी एक बार सुन ले

तू ठहराता है सही मेरा अपमान करने वालों की
याद रख तेरा वजूद मुझसे है मै तुझसे नहीं
बार-बार सुन ले हर बार सुन ले
तुझे लगता है मेरी बर्बादी के बाद तू रहेगा बड़े शान से
हटा गफलत का ये आइना औ
अपनी जमहूरियत  में बर्बादी का अंजाम देख ले |

Tuesday, 29 March 2016

रिश्ता होने का अर्थ

                                  रिश्ता (भाई ) होने का अर्थ 

        गलत होने पर समर्थन करना ये भाई होने का भाव नहीं प्रस्तुत करता बल्कि गलत होने पर उसके दंड में सहभागिता व्यक्ति के भाई होने का अर्थ प्रस्तुत करती है| यही हमारे समाज और संस्कृति की पहचान है |
न्याय अपनी जगह ,अन्याय अपनी जगह और रिश्ते अपनी जगह | सनातन धर्म भी इसी बात का समर्थन करता है की किसी व्यक्ति के कर्मो का फल उसके परिवार को भी भुगतना पड़ता है अपने भाई से खुस होना, नाराज होना इससे सुख दुःख की सहभागिता पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता | यही प्रकृति का नियम 
है; और नियति भी इसी नियम का पालन करती आयी है | परन्तु आधुनिकता के इस युग में इंसान नियति के इस नियम को बदलने की कोशिश में लगा है | ऐसी अवस्था ही क़यामत का लक्षण होती है |

युवा (youth)

                                     


                                 युवा क्या है ? क्यों जरूरी है युवा? क्या कर सकता है युवा जिसकी हर इन्सान को ,देश को ,समाज को जरूरत है?तो दोस्तों मै आपको बताना चाहूँगा युवा व्यक्ति की  वह अवस्था है जब उसके विचार चिंगारी से अंगार बन जाये उसके इरादे टहनी से पतवार बन जाये | इतिहास में लिखित उन देशभक्तों का नाम है ,क्रांतिकारियों का नाम है,विचारको का नाम है जिन्होंने देश ,समाज और मानवता की की बेहतरी के लिए हमेशा त्याग किया ,बलिदान दिया और इतिहास को बदल कर रख दिया |
                                परन्तु अफ़सोस की हमारा आज का युवा बंदिशों में जकड़ा हुआ है| जिसकी खुद की स्वतंत्रता को उसके ही समाज ने उसके ही माता पिता ने बाधित किया है सिर्फ इस दर से की कही वो अपने बच्चो को खो न दे | मेरा अनुरोध है उन माताओं से उन पिताओ से उस समाज से की किसी डर से अपने बच्चो की स्वतंत्रता को न बाधित करे उन्हें अपनों पैरो पर खड़े होने दे चलने दे, लड़खड़ाने दे, गिरने दे र खुद सम्हालने दे  ऐसे में मुनौअर राना जी की ये लाइने सजीव प्रतीत होती है |
                                              हवा के रुख पर रहने दो ये चलना सीख जायेगा
                                              की बच्चा लड़खड़ाएगा तो चलना सीख जायेगा 
                                 अपनों बच्चो को भरोसा  दे अपने प्यार का प्रेरित करे आगे बढ़ने के लिए और फिर देखिया युवा को , उसकी छमता को ,साहस  को उसके मजबूत इरादों को | आप देखेंगे  की क्रांति कैसे होती है , आप पायेगे के इतिहास कैसे बनता है |
                                  दोस्तों जिंदगी जीने मरने का नाम नहीं है जिन्दादिली का नाम है एक ही दिन जियो पर ऐसे की लोग याद रख सके | कैफ़ी जी की लाइने 
                                               जिन्दा रहने के मौसम बहुत है मगर 
                                               जान देने की रुत रोज आती नहीं 
                                               इश्क और हुश्न को रुशवा करे 
                                               वो जवानी जो खून से नहाती नहीं 
                                  तो दोस्तों जिन्दगी जिन्दादिली के साथ जिए तभी सच्चे अर्थो में आप युवा कहलाने के लायक होंगे |
                                                                                                                                       अनन्त निमोशी 
                                
                             

Saturday, 26 March 2016

WRITE

what to write ,
                 I know not
To whom is to fight
                 I know not
I love YoU
                 This is fact
YOU dont realise 
                 Infact
Love is like a way
                 greatones' frequently say
Is it everything and all?
                Love is something and Life is ALL.
                                              ANANT NIMOSHI

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Friday, 25 March 2016

अंतर्द्वंद्व

जब भी लिखने बैठता हूँ सबसे पहले अपने ऊपर नजर दौड़ता हूँ;अपने ऊपर मतलब अपने आचरण पर ,अपने विचार पर अपने कर्मो पर; अपने सोचने के तरीकों पर ; जी मै आज अपनी बात करूंगा केवल अपनी | सुबह उठते ही अपने आस पास के विचारों से सामना होता है | कोई ब्राह्मणवादी बातें करता है और उसके पक्ष में सैकड़ो तर्क देता ,कोई छत्रियों का क्षत्रियत्व बतलाता है,कोई दलित अत्याचार की कहानी सुनाता है...बाहर निकलता हूँ तो हिंदुत्व और इस्लाम की बाते सुनता हूँ | लोग जहर बोते रहते है | मै मन ही मन सोचता हूँ आज खूब गालियाँ  लिखूंगा | आज मै भी जहर उगलूँगा | लोग भ्रस्टाचार पर लम्बे लम्बे भाषण देते है | मै सुनता हूँ | स्थिति परिस्थिति  के हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया भी देता हूँ | बड़ा है तो सुन लेता हूँ; छोटा है तो उचित अनुचित समझाने का प्रयास करता हूँ | हर रोज कुछ इसी प्रकार की घटनाये घटित होती है | कभी कभी ये सब देखकर मन उदास भी होता है |लिखने की बारी अक्सर रात में आती है | शुरू करने से पहले ही मै सोचने पर मजबूर होता हूँ कि कौन सही है; और कौन गलत?? मेरा शांत दिमाग मुझे बताता है की आप पहले खुद को जानो आप क्या करते हो?
मै क्या करता हूँ ????
न मैं तो ग़रीब की मदद करता हूँ, लोगों से प्यार से बात करता हूँ, सबकी इज्ज़त करता हूँ,संस्कार तो मेरे खून में न मिटने वाले पदार्थ की तरह मिला हुआ है....हेंह! मेरे ऊपर शक...
अच्छा ये बताओ कि अगर कोई तुम पर अविश्वास करे, कोई तुम्हे कलुषित समझे,कोई तुम्हारा तिरस्कार करे या कोई तुम्हारी हर  बात पर टिप्पणी कर तब???...तब भी तुम उदार बने रहते हो???
नही, बिल्कुल नही। कोई मुझे अब कहता है तो मैं उसे क्या बे कह कर संबोधित करते हूँ; मैं कोई गाँधी थोड़े हूँ...हेंह...
अच्छा ये बताओ कि कभी तुमने किसी से ईर्ष्या नही की??
क्यों नही की; बिल्कुल की, जो मुझसे करता है, मैं भी उससे करता हूँ...करूँ क्यों न; मैं भगवान थोड़े हूँ
अब प्रश्न ये है कि सीधे, उल्टे तौर पर मैं भी लगभग वैसा ही करता हूँ जैसा लोग करते हैं; मात्रा कम या ज़्यादा हो सकती है, पर ऐसा क्यों???
अस्तित्व का संकट; जब मेरा मैं मुझे कचोटता है कि बेटा ये तो तुम्हारे अस्तित्व को नकार रहा है... तो मैं वो सब करता हूँ जो मेरी अपनी नज़र में अनैतिक है।
मै सचमुच पाता हूँ की मै भी लोगों से ज्यादा अलग नहीं हूँ | बिना टिकेट रेल यात्रा करना | अपने से बड़े छात्रावास के कर्मचारियों से काम करवाना; उन्हें डांटना | दस लोगों के बीच खुद को स्थापित करने की होड़ में किसी को कुछ भी कह देना |खुद जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए यहाँ हूँ उस पर ध्यान न देना | ऐसी  बहुत सी बातें दिमाग में कौंधने लगती है | मन खिन्न हो जाता है; कॉपी कलम बंद कर देता हूँ। सोचने बैठ जाता हूँ |कभी खुद की मानसिक कमजोरी का अहसास होता है,कभी लगता है सायद ऐसे जीवन आगे बढ़ता है ...
कुछ ना समझ  पाने की स्थिति में मुझे एहसास होता है ..................................
बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोई
जो दिल खोजा आपनो मुझ सा बुरा न कोई ||||
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बोलता हूँ कबीर बाबा की जै .....और सो जाता हूँ ..

Wednesday, 23 March 2016

जूठन

एक ओर जहा जूठन पढ़कर  दलित वर्ग  के युवाओ  , नवयुवको  में जोश  ,उत्साह  का प्रवाह  होने  की  सम्भावनाये  है  वही साथ ही साथ  दूसरी ओर बहुत सरे नवयुवको  में  मनुष्यता  के प्रति  द्वेष ,प्रतिकार  एवं  बदले  की भावना  का उदय होना भी  स्वाभविक  है | 
                                      जूठन  किसी  एक  दलित  या   चूहड़  मात्र की  कहानी  न  होकर  समाज की  बुरइयो  , कुरीतियों को  उजागर कर पाने का एक बेहतर  और  सफल  प्रयास  है  ओम प्रकाश  जी  की  आत्मकथा  जूठन  युवाओ  को एक  नयी  दिशा  प्रदान करेगी  | जहाँ  जातिवादी , धर्मवादी  मानसिकता  से ऊपर  उठकर  हमारे  समाज का  नवयुवक  राष्ट्रवादी  मानसिकता  धारण  कर  सकेगा  जो सीधे  देश  एवं  राष्ट्र  के  निर्माण  में  अपनी  भूमिका  निभाएगा ..................
                                                                                                                                         अनन्त  निमोशी