Saturday, 9 April 2016

"जूठन " क्या सीखा???

ओम प्रकाश जी द्वारा लिखित जूठन किसी जाति  की नहीं अपितु हमारे चित-परिचित  एवम अग्रणी  कहे जाने वाले समाज के पिछडे  पन का एहसास  कराती है की कैसे हमारे समाज के उत्क्रष्ट लोग जाति ,बिरादरी , धर्म के नाम पर निम्न स्तरीय जीवन यापन करने वाले लोगो को आतंकित एवम प्रताड़ित  करते थे ।
          आत्मकथा जूठन हमारे समाज के उस घिनौने और क्रूर समाज का दर्पण है जहा मानवता और  इंसानियत केवल नाम मात्र की चीज बची है जहा लोग  जाति , धर्म  के आधार पर  किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की  पहचान करते है पुस्तक में सवर्णो का दलितों पर ही नहीं  बल्कि जाति के उचे दलितों का अपने से निम्न स्तरीय दलितों पर होने वाले अत्याचारों का भी वर्णन किया गया है जो हमारे सम्पूर्ण  समाज की सोच का भी आइना है
          एक पाठक के तौर पर मै समझता हूँ कि हमारे समाज में जातिवाद , धर्मवाद इस कदर हावी है जैसे मानो मनुष्य के अन्दर की मानवीयता जो इन्सान को  पशुओं से अलग करती है, ख़त्म होती जा रही है अक्सर लोग खुद के हित के लिए जातिवाद ,धर्मवाद के नाम पर नवयुवको को भड़काते समय यह भूल जाया करते है की किसी जाती या धर्म का अनुयाही होने से पहले हम एक इन्सान है।  हमारे समाज के विकास एवं निर्माण के समय प्राचीन काल में विद्वानो ने धर्मं बनाया ,जाति बनाई ताकि हर एक इन्सान एक दूसरे इन्सान के काम आ सके ,पारस्परिक सहयोग की भावना जाग्रित हो सके और वे एक ही समाज में प्यार से एकसाथ -एकजुट होकर रह सके । परन्तु आज स्थिति कुछ और है जाती और धर्म को लोग अपनी अस्मिता और प्रतिष्ठा के तौर पर देख रहे है परस्पर सहयोग की भावना जो धर्म और जाति के उद्भव की मूलभूत आवश्यकता थी,भूल गए है |
हमारे देश ने राजतन्त्र नहीं स्वीकारा, लोकतंत्र स्वीकारा जहाँ राजा का लड़का ही राजा नहीं होता बल्कि जनता जनार्दन के चरणों की पग्धुलि जिस व्यक्ति के मस्तक पर लग जाती उस व्यक्ति का राजतिलक हो जाता है चाहे वह किसी जाति, बिरदारी या धर्म का ही क्यों न हो | लोकतंत्र को मानने वाले मेरे दोस्तों यदि आप राजा के लड़के को राजा नहीं  स्वीकार सकते तो ब्राह्मण क्षत्रीय,वैश्य या शूद्र के बच्चो को ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य या शूद्र कैसे मान  सकते है  आज हमारे समाज में युवाओ को एक ऐसे समाज के निर्माण की आवश्यकता है जहा जाति, धर्म .बिरादारी से ऊपर उठकर लोग ज्ञान,एकता ,शील और परस्पर सहयोग की भावना जागृत कर सके | तभी सच्चे अर्थो में समाज का निर्माण हो सकेगा जो  देश एवं राष्ट्र के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा |

Thursday, 7 April 2016

"NECESSITIES"

                                      

                                                  Everything is necessary
                    you are necessary
                                          I would be
                   Good is necessary
                                          Bad may be
                   Laughing is necessary
                                          Weeping may be
                   Loving is necessary
                                          To hate may be
                   To live is necessary
                                          To die may be
                                                                    
                                                             ANANT NIMOSHI

Wednesday, 6 April 2016

क्या लिख दूं

आज का आज लिख दूं
शासकों का  इतिहास लिख दूं
बर्बरता की कहानी पर
बैठे बिठाये किताब लिख दूं

सहम जाता हूँ मै सच्चाई लिखते लिखते
कोशिश करता हूँ  इनकी क्रूर बीरता की बड़ाई लिख दूं
कलम गर न करे बगावत तो वाहवाही लिख दू
भूल जातें  हैं लोग ऊँची इमारते देख कर
गरीबों के घुटन की दुहाई लिख दूं


अनंत निमोशी

Tuesday, 5 April 2016

हिंदुस्तान की वर्त्तमान स्थिति

हिंदुस्तान की स्थिति भी मेरे घर सी हो गई है
नींव की ईट बनने को कोई तैयार ही नहीं है
सब आई ए एस ही बनना चाहते है
हिंदुस्तान की परम्परा है घर बनाना, अब घर बनाने के लिए तो ईटा चाहिए न | वो भी मजबूत ईट । अरे जिससे नींव बनती है | एक बार नींव बन जाय फिर तो कैसा भी ईटा चल जायेगा | ईंटों से और गारों से घर नहीं बनता साहब, घर वालों से बनता है | तो नीव की ईट चाहिए । मजबूत ,शशक्त, कठोर जिसके ऊपर इमारत बनाई जा सके | अब जो मजबूत है ,कठोर है शशक्त है |कहने का तात्पर्य है जो सक्षम है, वो नींव क्यों बने | वो तो बुलंदियां छूना चाहता है | और चाहे क्यों न उसका हक़ है | तो साहब जानि लेव अइसन घरों न बनि पायी | रहो सभे असुरक्षित आसमान के नीचे | जब ओला और गोला बरसी तब समझ मा आई के घर काहे बारे जरुरी है |
#हिंदुस्तान की राजनीति 

Sunday, 3 April 2016

सस्ती लोकप्रियता

जी एक टेर्मिनोलोजी है सस्ती लोकप्रियता......
सस्ती लोकप्रियता का मतलब ऐसी लोकप्रियता से है जो सस्ते में बिना किसी परिश्रम के मुफ्त में मिल जाती है.....
अब मै विषय पर आता हूँ | कैलाश सत्यार्थी !!!!!!! नाम कुछ सुना सा लगा होगा | थोडा दिमाग पर जोर डालते है | अब कुछ लोगो को याद आता है ओ हाँ नोबल प्राइज विनर | जी महज 26 साल की उम्र में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ दी | बचपन बचाओ आन्दोलन की शुरुआत की क्योकि क्योकि उन्हें आज के बच्चो में कल का जिम्मेदार इंसान दिखता था| विश्व भर के 144 देशों के 83000 से अधिक बच्चों के भविष्य को सवारने का काम किया | 35 साल निस्वार्थ मेहनत करने के बाद नोबल पुरस्कार मिलता है और 61 वर्ष कीअवस्था में हम और आप ऐसे महात्मा के बारे में थोडा बहुत जान पाते हैं................
जी और दूसरा नाम है कन्हैया कुमार जे.एन.यु. अध्यक्ष | जो मात्र एक बयानबाजी से देश भर में मशहूर हो गया | और मै दावे के साथ कह सकता हूँ की आप इस इंसान को कभी नहीं भूलेंगे कैलाश सत्यार्थी को चाहे भूल जांय | टी वी पर न्यूज़ चैनल्स में, रेडियो पर फेसबुक पर, ट्विटर पर हर जगह आपको ये कन्हैया कुमार मिल जायेंगे | मै कड़े तौर पे इस इंसान की निंदा भी नहीं करूंगा | आखिर मै जानता ही कितना हूँ सिर्फ सुनी सुनाई बाते | परन्तु मुझे एक बात नहीं समझ आती की हंगामा इत्ता क्यों है| क्या हम आप किसी के इशारों पर चल रहे है कल तक सहिष्णुता/असहिष्णुता,कलबुर्गी,सनातन संस्था ,सम्मान वापसी चल रही थी,लोग किसी इंसान के मरने पर भी उसके आदर्शो के खिलाफ राजनीति कर ले रहें थे ,और अब ये कन्हैया कुमार | कौन है ???????????????
जो हमें जैसा चाहता है सोचने पर मजबूर कर देता है | हम आप वैसा ही सोचते है जैसा सामने वाला चाहता है |
जी मीडिया की भागीदारी भी बराबर ही है और हमारी आपकी भी | और जब तक ये हम आप इस प्रकार की ख़बरें चाव से देखते रहेंगे तबतक सस्ती लोकप्रियता बटोरने के चक्कर में इस प्रकार की बयानबाजी और भाषानबाजी होती रहेगी ..........
‪#‎दिमाग‬ का दही

Saturday, 2 April 2016

सिनेमा तक समाज



मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो सोच सकता है उसकी अभिव्यकि कर सकता है अपने आस पास घट रही घटनाओं का आंकलन कर सकता कार्य और कारण के बीच सम्बन्ध स्थापित कर सकता है| अर्थात समझ बूझ सकता है और इसी आधार पर सीख कर सामाजिक प्राणी होने की आधारशिला विकसित करता है | सीधे शब्दों में मनुष्य एक नकलची प्रवृति का प्राणी है जो देख-देख के सीखता है | और फिर उसमे परिमार्जन करता है और अपनी समझ के आधार पर विकास करता है | हर इंसान के ऊपर उसके आस पास की वस्तुओं का घटनाओं का वातावरण का प्रभाव पड़ना बड़ी ही स्वाभाविक प्रक्रिया है क्योकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसकी आवश्यकताओं की पूर्ती समाज द्वारा ही संभव है | इस प्रकार के प्रभाव ने ही मनुष्य को जंगली, बर्बर, आदिमानव से सामाजिक इंसान बना दिया | और जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य होता गया मनुष्य सीखने के लिए अपने विचारों के आदान प्रदान के लिए ढेर सारे तरीके इजात करने लगा | कभी पक्षियों द्वारा संदेशों का सम्प्रेषण किया तो कभी हरकारों द्वारा | आज स्थिति बदल चुकी है| मनुष्य ने हवाओं के माध्यम से संदेशों का सम्प्रेषण करने की कला में महारत हासिल कर ली है | टी वी , रेडियो ,टेलीफोन ,फैक्स ,कंप्यूटर इन्टरनेट जैसे तमाम स्रोत है जिसके माध्यम से हम सूचनाओ को बड़ी ही आसानी से बहुत कम समय में एक बड़े समूह तक पंहुचा सकते है | टेलीविज़न उनमे से एक है जिसके माध्यम से सूचनाओं का सम्प्रेषण बड़ी आसानी से होता है | टेलीविज़न के कार्यक्रमों समाचार, रियलिटी शो इन्फोटेन्मेंट शो और सिनेमा द्वारा यह प्रक्रिया चलती रहती है | और मनुष्य और समाज को प्रभावित करती रहती है | सिनेमा समाज को प्रभावित करने की दौड़ में सबसे आगे है क्योकि यह एक दृश्य श्रव्य माध्यम है |

Friday, 1 April 2016

" LIttLE "

  

little you are 
            and little is this world
loving you are
            and loving is this world
different you are 
            and different is this world
good you are 
           and good is this world
as you are
           the world is so...........

                                             ANANT NIMOSHI