पत्र – लेखन
पत्र-लेखन संचार माध्यम का एक अनूठा तरीका,
जिसमे प्रेषक शब्दों को भावनाओं में पिरोकर बिना अपनी उपस्थिति के प्राप्तकर्ता को
अपनी उपस्थिति का एहसास कराता है. पत्रों का सिलसिला यूं आज का नही है अपितु मानव
समाज के विकास में पत्रों ने अहम भूमिका निभाई है. संचार क्रांति के बाद भी पत्रों
में निहित गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए तमाम व्यवसायिक कम्पनियों ने व्यापारिक
डाक को ही संचार के लिए सर्वाधिक महत्व दिया.
दुनियां का सबसे पुराना ज्ञात पत्र ईसा पूर्व
की २०वीं सदी कालखण्ड में सुमेरु का माना जाता है, जो की मिटटी की पटरी पर लिखा
गया. मनुष्य की विकास यात्रा के साथ पत्रों का सिलसिला भी शुरू हुआ, अति प्राचीन
काल में संकेतों से सन्देश सम्प्रेषण की परम्परा थी. लिपियों के आविष्कार के बाद शिलाखंड,
धातुपत्र, कपड़े या वृक्ष के पत्तो के विभिन्न स्वरूप पत्र भेजने के साधन बने. कागज
व लेखन सामग्री के अविष्कार तथा डाक-प्रणाली के व्यवस्थित विकास के बाद तो पत्रों
को तो जैसे पंख से लग गये.
वैसे तो भारत में व्यवस्थित पत्र-प्रणाली
१७७४ ई. में ब्रिटिश गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने स्थापित की थी, परन्तु पत्र व्यव्हार की परम्परा भारत में बहुत पुरानी है.
नल-दमयंती के बीच हंस ने डाकिया का कार्य किया इसी प्रकार अन्य कई प्रेम प्रसंगों
में कबूतर और तोते जैसे पक्षियों को डाकिये का स्वरूप दिया गया. राजाओं महाराजाओं तथा
मुग़ल शासकों ने हरकारों के जरिये सन्देश सम्प्रेषण का कार्य किया. भारतीय
स्वतंत्रता संघर्ष में भी पत्रों ने एक खास भूमिका निभाई है.
संचार को जन्म और पंख देने वाला संचार का यह
ऐतिहासिक माध्यम पत्र लेखन हमारे आज के इस आधुनिक जगत में अपनी पहचान और वजूद खोता
नजर आ रहा है लोग इसे बिशेष अवसरों पर मनोरंजन के तौर पर ही उपयोग में ला रहे है|
सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि संचार के इस माध्यम की अहमियत और उपयोगिता भी कम हुई है|
जादातर छात्रो के लिए तो यह मनोरंजन का
साधन बन के रह गया है, गृहणी महिलाओं के सर्वेक्षण से पता चलता है कि महिलाये केवल
विशेष अवसरों पर ही पत्र लिखती है ,किसानो के लिए भी इसकी कोई खास उपयोगिता नहीं
है , परन्तु कर्मचारियों के सर्वेक्षण से पता चलता है कि सरकारी दफ्तरों में आज भी
पत्रों की अहमियत और उपयोगिता जीवंत है जो की किसी निजी संस्था द्वारा पत्र न भेजकर
सरकारी डाक द्वारा पत्र भेजना अधिक पसंद करते है |
लगभग ८० फ़ीसदी विद्यार्थियों ने इसे
आंशिक उपयोगी माना जैसा की साधारण गृहणिया भी मानती है ग्रामीण किसान भी इसे आंशिक
उपयोगी मानते है जिनकी प्रतिशतता ६० है ,परन्तु सरकारी कर्मचारियों ने इसे सबसे
अधिक महत्ता देते हुए ,६० फ़ीसदी लोगो ने अत्यधिक् उपयोगी की श्रेणी में रखा जबकि
४० % ने आंशिक |
जिन्होंने यह मन कि उनके जीवन में
पत्रों कि किसी न किसी वजह से उपयोगिता है उन्होंने इसे गोपनीयत और निजी अनुभवों
के कारण उपयोगिता की श्रेणी में रखा |
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