मेलो की संस्कृति में इलाहाबाद
अनेकता में एकता के सूत्र को
संजोये हुए भारतीय संस्कृति में मेलो के पर्व का विशेष महत्व है मेला किसी भी
स्थान की समृध्द सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक होता है |
इलाहाबाद की सांस्कृतिक विरासत का
आंकलन इलाहाबाद में लगने वाले लगभग 100 मेलो
से किया जा सकता है जिसमे सबसे बड़ा मेला है माघ मेला | 1935-40 के समय प्रत्येक वर्ष 3-4 लाख यात्री प्रतिवर्ष त्रिवेणी स्नान के लिए
इलाहाबाद आते थे | हर छठे वर्ष अर्धकुम्भ के अवसर पर यह भीड़ 10-15 लाख पहुच जाती थी वाही प्रत्येक 12 वे वर्ष कुम्भ के अवसर पर यह भीड़ 30-35 लाख तक पहुच जाती है | सन 2013 में कुम्भ के अवसर पर 5 वर्ग किमी अर्थात 10339 बीघे जमीन पर विस्तृत इस मेले में स्नानार्थियो की संख्या 5 करोड़ तक पहुच गई जो लगभग 55 दिन तथा 55 रात्रि दर्शन एवं उत्सव का केंद्र रहा |
कुम्भ का अर्थ है घड़ा तथा एक राशि
का नाम है | पुरानो में वर्णित कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय विभिन्न वस्तुओ
के साथ-साथ अमृत कलश की भी उत्पत्ति हुई जिसे असुरो से बचने के लिए देवतागण भागे
जिनका असुरो ने पिछा किया निरंतर 12 दिन
तथा 12 रात्रि दौड़ते समय अमृत कलश से कुछ बूंदे हरिद्वार ,
नाशिक , प्रयाग और उज्जैन में गिरी | इसी घटना के स्मारक के रूप में प्रति 12 वे वर्ष कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है|
जब बृहस्पति मेष राशि में तथा
चन्द्रमा और सूर्या मकर राशि में होते है तो प्रयाग में ऐसे योग कुम्भ कहलाता है|
इलाहाबाद में कुम्भ मेले का सबसे पुराना उल्लेख महाराजा हर्ष के समय का मिलता है ,
जिसे चीन के प्रसिद्ध भिक्षु ने ईशा की सातवी शताब्दी में अपनी आँखों से देख कर
लिखा था |
बौद्ध भिक्षुओ में एक पुरानी प्रथा
यह प्रचलित थी प्रत्येक शुक्ल पक्ष की द्वितीया
तथा पूर्णिमा को वे एकत्र होकर वे प्रायश्चित के रूप में अपने-अपने पापों
को स्पष्ठतया स्वीकार करते थे |
महाराजा हर्ष के समय यह प्रायश्चित
प्रत्येक छठे वर्ष हुआ करता था जिसे लोग आनंद की खेती कहते थे यह अवसर ही
अर्धकुम्भी या कुम्भ का होता था | महाराजा हर्ष ने छठी बार इसका आयोजन हेन सान्ग
के समय किया था |
इसके अतिरिक्त इलाहाबाद में लगने
वाला दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मेला दधिकांदो का मेला है जो अलग-अलग तिथियों पर
प्रयाग के ६ अलग-अलग स्थानों पर लगता है जिसमे सलोरी, रसूलाबाद-तेलियरगंज, राजापुर
एवं कतरा प्रमुख है | परम्परागत रूप से ये श्रीकृष्ण छठी के बाद पहले शनिवार को
सलोरी में , बड़ा इतवार को राजापुर और उससे पहले तेलियरगंज के दधिकांदो मेले का
आयोजन होता है जो “नवयुवक संघ दधिकांदो मेला कमेटी आयोजित करती है | बाढ़ की वजह से
पिछले गत वर्षो में मेले के आयोजन में फीकापन देखने को मिला है |
इसके अतिरिक्त अषाढ़ के कृष्ण पक्ष
की अष्ठमी को कड़ा की सीतला देवी का मेला लच्क्षगिरी तहसील हंडिया के सोमवती
अमावश्या का मेला और वारूणी के अवसर पर गंगा स्नान के मेले होते है | इसके पश्चात्
पंडीला तहसील सोराव के महादेव का मेला और ककरा तहसील फूलपुर के दुर्वाषा का मेला
है जोकि शिवरात्रि के अवसर पर मनाये जाते है | जेठ के महीने में सिकंदरा तहसील
फूलपुर में गाज़ी मिया का मेला और आषाड में परगना बारा में अमिलिया देवी का मेला
आयोजित होता है जिसमे हजारो की संख्या में भीड़ होती है |
ये तो वे मेले है प्रयाग में
प्रतिवर्ष बड़े ही धूम धाम से बिना किसी अवरोध के मनाये जाते रहे है| इसके अतिरिक्त
कुछ ऐसे भी मेले है जो बीच में अपना अस्तित्व खोते नजर आ रहे थे परन्तु आज एक बार
फिर अपनी पुरानी रंगत में नजर आते है जिसमे प्रयाग का दशहरे का मेला प्रमुख है जो
१९२४ में हिन्दू –मुस्लिम दंगे तथा मश्जिदो के सामने बाजे बाजने पर मुसलमानों
द्वारा प्रश्न उठाने मेला स्थगित हो गया था | इस मेले के आयोजन के चार केंद्र थे
जिसमे कटरे और दारागंज के मेले प्रसिद्ध थे वर्तमान में इन मेलो का आयोजन फिर से
शुरू किया गया है जो सुचारू रूप से बिना किसी अवरोध के चल रहे है |
इसके अतिरिक्त मोहर्रम के मेले भी
विभिन्न स्थानो पर सफलतापूर्वक मनाये जाते है | इन सब के अतिरिक्त प्रयाग में
निम्न स्तर पर ढेर सारे मेलो का आयोजन किया जाता है जो प्रयाग में मानव समाज की
एतिहासिकता का चित्र प्रस्तुत करती है| इनके आयोजनों के पीछे विभिन्न प्रकार के
सामाजिक कारण होते है जिनमे कभी देवताओ की असुरो पर विजय तो कभी किसी समाज सुधारक
संन्यासी का समाज के लिए संघर्ष, कभी किसी रजा का अपनी प्रजा के लिए समर्पण तो कभी
स्वतंत्रता सनानियो का अंगेजो के बिरुद्ध लड़ाई इत्यादि | कारण चाहे जो भी रहा हो
परन्तु उद्देश्य सदैव सर्वसाधारण की भलाई तथा जन कल्याण से ही जुदा रहा | देश के
अन्य शहरो में भले ही लोग अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हो | परन्तु प्रयाग का
नाम आज भी अपनी परम्पराओ और संस्कृतियो के लिए ही जाना जाता है और उम्मीद है मेलो
के आयोजन से ऐसी परम्पराओ और संस्कृतियों को बढ़ावा मिलेगा |
achha prayas..
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