मेरी माँ मेरे लिए खाना पकती है ये उसका कर्त्तव्य है ,पिता न जाने किन विषम परिस्थितियों में पैसे काम कर लातें हैं ,ये उनका कर्त्तव्य है | हमें हर जगह दूसरों का कर्त्तव्य दिखाई पड़ता है जैसे हमारा कोई कर्तव्य ही न हो |
गर्मियों में भी चूल्हे की आंच के सामने जब एक माँ भोजन पकाती है और एक पिता ४५ डिग्री सेल्सिउस तापमान होने के बावजूद भरी दोपहरी में जब चार पैसे कामने के लिए तपता है तो उसे अपने पिता होने का कर्त्तव्यबोध नहीं बल्कि वात्सल्यबोध होता है | उस वक्त उन्हें चूल्हे और ज्येष्ठ की तपन नहीं अपने बच्चो की खुशी याद आती है | एक माँ सोचती है बढ़िया भोजन करके मेरा बेटा खुश हो जायेगा और एक पिता सोचता है की इन पैसो से उसकी वो जरूरते पूरी करूंगा जो मै नहीं कर पाया | पर क्या हमारा इतना भी फर्ज नहीं बनता इसके एवज हम अपने माँ पिता को धन्यावाद ज्ञापित करे | शब्द जरुर छोटे है मगर इनमे चमत्कारिक ताकत है | इन शब्दों से इंसान जीवंत हो उठता है | वो खुद को उर्जावान महसूस करता है |
तो हर उस इंसान को जिसने कभी आपकी खुशी के लिए कुछ किया हो शुक्रिया जरूर कहें .....
ख़ूबसूरत,शुक्रिया काबिलेतारीफ
शब्द हैं शब्दों का कमाल देख ले
इंसानियत जिन्दा रहती है इन चंद लफ्जों से
एक बार कह के देख ले एक बार सुन के देख ले ॥॥
गर्मियों में भी चूल्हे की आंच के सामने जब एक माँ भोजन पकाती है और एक पिता ४५ डिग्री सेल्सिउस तापमान होने के बावजूद भरी दोपहरी में जब चार पैसे कामने के लिए तपता है तो उसे अपने पिता होने का कर्त्तव्यबोध नहीं बल्कि वात्सल्यबोध होता है | उस वक्त उन्हें चूल्हे और ज्येष्ठ की तपन नहीं अपने बच्चो की खुशी याद आती है | एक माँ सोचती है बढ़िया भोजन करके मेरा बेटा खुश हो जायेगा और एक पिता सोचता है की इन पैसो से उसकी वो जरूरते पूरी करूंगा जो मै नहीं कर पाया | पर क्या हमारा इतना भी फर्ज नहीं बनता इसके एवज हम अपने माँ पिता को धन्यावाद ज्ञापित करे | शब्द जरुर छोटे है मगर इनमे चमत्कारिक ताकत है | इन शब्दों से इंसान जीवंत हो उठता है | वो खुद को उर्जावान महसूस करता है |
तो हर उस इंसान को जिसने कभी आपकी खुशी के लिए कुछ किया हो शुक्रिया जरूर कहें .....
ख़ूबसूरत,शुक्रिया काबिलेतारीफ
शब्द हैं शब्दों का कमाल देख ले
इंसानियत जिन्दा रहती है इन चंद लफ्जों से
एक बार कह के देख ले एक बार सुन के देख ले ॥॥