जब भी लिखने बैठता हूँ सबसे पहले अपने ऊपर नजर दौड़ता हूँ;अपने ऊपर मतलब अपने आचरण पर ,अपने विचार पर अपने कर्मो पर; अपने सोचने के तरीकों पर ; जी मै आज अपनी बात करूंगा केवल अपनी | सुबह उठते ही अपने आस पास के विचारों से सामना होता है | कोई ब्राह्मणवादी बातें करता है और उसके पक्ष में सैकड़ो तर्क देता ,कोई छत्रियों का क्षत्रियत्व बतलाता है,कोई दलित अत्याचार की कहानी सुनाता है...बाहर निकलता हूँ तो हिंदुत्व और इस्लाम की बाते सुनता हूँ | लोग जहर बोते रहते है | मै मन ही मन सोचता हूँ आज खूब गालियाँ लिखूंगा | आज मै भी जहर उगलूँगा | लोग भ्रस्टाचार पर लम्बे लम्बे भाषण देते है | मै सुनता हूँ | स्थिति परिस्थिति के हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया भी देता हूँ | बड़ा है तो सुन लेता हूँ; छोटा है तो उचित अनुचित समझाने का प्रयास करता हूँ | हर रोज कुछ इसी प्रकार की घटनाये घटित होती है | कभी कभी ये सब देखकर मन उदास भी होता है |लिखने की बारी अक्सर रात में आती है | शुरू करने से पहले ही मै सोचने पर मजबूर होता हूँ कि कौन सही है; और कौन गलत?? मेरा शांत दिमाग मुझे बताता है की आप पहले खुद को जानो आप क्या करते हो?
मै क्या करता हूँ ????
न मैं तो ग़रीब की मदद करता हूँ, लोगों से प्यार से बात करता हूँ, सबकी इज्ज़त करता हूँ,संस्कार तो मेरे खून में न मिटने वाले पदार्थ की तरह मिला हुआ है....हेंह! मेरे ऊपर शक...
अच्छा ये बताओ कि अगर कोई तुम पर अविश्वास करे, कोई तुम्हे कलुषित समझे,कोई तुम्हारा तिरस्कार करे या कोई तुम्हारी हर बात पर टिप्पणी कर तब???...तब भी तुम उदार बने रहते हो???
नही, बिल्कुल नही। कोई मुझे अब कहता है तो मैं उसे क्या बे कह कर संबोधित करते हूँ; मैं कोई गाँधी थोड़े हूँ...हेंह...
अच्छा ये बताओ कि कभी तुमने किसी से ईर्ष्या नही की??
क्यों नही की; बिल्कुल की, जो मुझसे करता है, मैं भी उससे करता हूँ...करूँ क्यों न; मैं भगवान थोड़े हूँ
अब प्रश्न ये है कि सीधे, उल्टे तौर पर मैं भी लगभग वैसा ही करता हूँ जैसा लोग करते हैं; मात्रा कम या ज़्यादा हो सकती है, पर ऐसा क्यों???
अस्तित्व का संकट; जब मेरा मैं मुझे कचोटता है कि बेटा ये तो तुम्हारे अस्तित्व को नकार रहा है... तो मैं वो सब करता हूँ जो मेरी अपनी नज़र में अनैतिक है।
मै सचमुच पाता हूँ की मै भी लोगों से ज्यादा अलग नहीं हूँ | बिना टिकेट रेल यात्रा करना | अपने से बड़े छात्रावास के कर्मचारियों से काम करवाना; उन्हें डांटना | दस लोगों के बीच खुद को स्थापित करने की होड़ में किसी को कुछ भी कह देना |खुद जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए यहाँ हूँ उस पर ध्यान न देना | ऐसी बहुत सी बातें दिमाग में कौंधने लगती है | मन खिन्न हो जाता है; कॉपी कलम बंद कर देता हूँ। सोचने बैठ जाता हूँ |कभी खुद की मानसिक कमजोरी का अहसास होता है,कभी लगता है सायद ऐसे जीवन आगे बढ़ता है ...
कुछ ना समझ पाने की स्थिति में मुझे एहसास होता है ..................................
बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोई
जो दिल खोजा आपनो मुझ सा बुरा न कोई ||||
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बोलता हूँ कबीर बाबा की जै .....और सो जाता हूँ ..
मै क्या करता हूँ ????
न मैं तो ग़रीब की मदद करता हूँ, लोगों से प्यार से बात करता हूँ, सबकी इज्ज़त करता हूँ,संस्कार तो मेरे खून में न मिटने वाले पदार्थ की तरह मिला हुआ है....हेंह! मेरे ऊपर शक...
अच्छा ये बताओ कि अगर कोई तुम पर अविश्वास करे, कोई तुम्हे कलुषित समझे,कोई तुम्हारा तिरस्कार करे या कोई तुम्हारी हर बात पर टिप्पणी कर तब???...तब भी तुम उदार बने रहते हो???
नही, बिल्कुल नही। कोई मुझे अब कहता है तो मैं उसे क्या बे कह कर संबोधित करते हूँ; मैं कोई गाँधी थोड़े हूँ...हेंह...
अच्छा ये बताओ कि कभी तुमने किसी से ईर्ष्या नही की??
क्यों नही की; बिल्कुल की, जो मुझसे करता है, मैं भी उससे करता हूँ...करूँ क्यों न; मैं भगवान थोड़े हूँ
अब प्रश्न ये है कि सीधे, उल्टे तौर पर मैं भी लगभग वैसा ही करता हूँ जैसा लोग करते हैं; मात्रा कम या ज़्यादा हो सकती है, पर ऐसा क्यों???
अस्तित्व का संकट; जब मेरा मैं मुझे कचोटता है कि बेटा ये तो तुम्हारे अस्तित्व को नकार रहा है... तो मैं वो सब करता हूँ जो मेरी अपनी नज़र में अनैतिक है।
मै सचमुच पाता हूँ की मै भी लोगों से ज्यादा अलग नहीं हूँ | बिना टिकेट रेल यात्रा करना | अपने से बड़े छात्रावास के कर्मचारियों से काम करवाना; उन्हें डांटना | दस लोगों के बीच खुद को स्थापित करने की होड़ में किसी को कुछ भी कह देना |खुद जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए यहाँ हूँ उस पर ध्यान न देना | ऐसी बहुत सी बातें दिमाग में कौंधने लगती है | मन खिन्न हो जाता है; कॉपी कलम बंद कर देता हूँ। सोचने बैठ जाता हूँ |कभी खुद की मानसिक कमजोरी का अहसास होता है,कभी लगता है सायद ऐसे जीवन आगे बढ़ता है ...
कुछ ना समझ पाने की स्थिति में मुझे एहसास होता है ..................................
बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोई
जो दिल खोजा आपनो मुझ सा बुरा न कोई ||||
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बोलता हूँ कबीर बाबा की जै .....और सो जाता हूँ ..
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